महर्षि पतंजलि जीवन परिचय | Maharishi Patanjali Biography in Hindi

Maharishi Patanjali Biography, History, Story in Hindi (महर्षि पतंजलि का जीवन परिचय) : प्राचीन भारत में ऐसे अनेकों महापुरुषों ने जन्म लिया था, जिन्होंने भारतीय संस्कृति एवं आलोक को दूर-दूर तक कई देशों तक पहुंचाया. ऐसे ही महान ऋषि-मुनियों में से एक है "महर्षि पतंजलि" इन्होंने दुनिया को योग जैसे प्रतिष्ठित कला से नवाजा है. आज के युग में योग पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो चुका है, और लाखों लोगों को योग करने से लाभ हो रहा है. इसका पूरा श्रेय "महर्षि पतंजलि" को जाता है. आज इस लेख के माध्यम से हम योग शास्त्र के जनक महर्षि पतंजलि के बारे में विस्तार से जानेंगे.

महर्षि पतंजलि जीवन परिचय - Maharishi Patanjali Biography in Hindi

Maharishi Patanjali

महर्षि पतंजलि भारत के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वानों में से एक हैं. इनके जन्म के विषय में कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता है. कई अंदाजन प्रमाणों के अनुसार पतंजलि ऋषि पाटलिपुत्र के राजा पुष्यमित्र शुंग के समकालीन (185 से 63 ईसा पूर्व) के माने जाते हैं.

महर्षि पतंजलि अपने तीन प्रमुख कार्यों के लिए विख्यात हैं. प्रथम तो व्याकरण की पुस्तक 'महाभाष्य' के लिए तथा दूसरा "पाणिनि अष्टाध्याई का टीका" लिखने के लिए और तीसरा व सबसे प्रमुख 'योग शास्त्र यानी कि (पतंजलि योग सूत्र) की रचना के लिए ये विशेष रूप से जाने जाते हैं.

महर्षि पतंजलि ने महाभाष्य की रचना काशी में की, काशी में 'नागकुआं' नामक स्थान पर इस ग्रंथ की रचना हुई थी. नाग पंचमी के दिन इस कुएं के पास अब भी अनेक विद्वान एवं विद्यार्थी एकत्र होकर संस्कृत व्याकरण के संबंध में शास्त्रार्थ करते हैं. महाभाष्य व्याकरण का ग्रंथ है, किंतु इसमें साहित्य, धर्म, भूगोल, समाज, रहन-सहन आदि से संबंधित तथ्य मिलते हैं.

महर्षि पतंजलि की मृत्यु के 300 साल बाद इनकी पुस्तक लुप्त हो गई, क्योंकि उस युग में पुस्तक छापने की मशीन नहीं थी तथा हाथ से लिखी पुस्तकों की एकाध प्रतियां होती थी. आज से लगभग 11 वर्ष पहले कश्मीर के राजा जयदित्य ने बड़े परिश्रम से इस पुस्तक की खोज की. उन्होंने पूरी पुस्तक दोबारा कई प्रतियों में लिखवाकर अपने राज्य में उसका प्रचार करवाया.

 तब से आज तक इसकी पढ़ाई होती चली आ रही है. आज जो महाभाष्य का ज्ञान नहीं रखता उसे संस्कृत भाषा का ज्ञाता कहना गलत होगा. पतंजलि ने संस्कृत भाषा को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया. इतने प्राचीन काल में विश्व के किसी भी देश में व्याकरण का ऐसा विद्वान नहीं हुआ. महर्षि पतंजलि उन महापुरुषों में से एक हैं, जो एक देश में जन्म लेकर पूरे विश्व के हो जाते हैं.

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