स्वामी विवेकानंद की जीवनी पर निबंध | Biography, Essay on Swami Vivekananda in Hindi



स्वामी विवेकानंद के जीवन पर निबंध | Biography & Essay on Swami Vivekananda in Hindi

Swami Vivekanand

Essay / Biography on Swami Vivekananda in Hindi ( स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय एवं निबंध ) :  "यदि कोई व्यक्ति यह समझता है कि वह दूसरे धर्मों का विनाश या अपमान करके अपने धर्म की विजय कर लेगा, तो भाइयों! उसकी यह आशा कभी पूरी नहीं होने वाली. सभी धर्म हमारे अपने हैं, इस भाव से उन्हें अपनाकर ही हम अपना और संपूर्ण मानव जाति का विकास कर पाएंगे. यदि भविष्य में कोई ऐसा धर्म पैदा होता है जिसे संपूर्ण विश्व का धर्म कहा जाएगा तो वह अनन्त और निर्बाध होगा. वह धर्म ना तो हिंदू होगा, न मुसलमान, न बौद्ध और न इसाई अपितु वह इन सब के मिलन और सामंजस्य से पैदा होगा".

यह वह शब्द हैं जिन्होंने विश्व मंच पर भारत की सिरमौर छवि को प्रस्तुत किया और संसार को यह मानने पर विवश कर दिया कि भारत विश्व गुरु था, विश्व गुरु है और विश्व गुरु ही रहेगा. यह शब्द 11 सितंबर सन 1993 को शिकागो (अमेरिका) में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन के मंच पर 'स्वामी विवेकानंद जी' ने कहे थे. आज के इस लेख में हम आपको 'स्वामी विवेकानंद के जीवन (essay on Swami Vivekanand)' से अवगत कराएंगे हम आशा करते हैं, स्वामी विवेकानंद के जीवन से संबंधित यह लेख आपको पसंद आएगा.

स्वामी विवेकानंद जीवनी एवं निबंध - Essay on Swami Vivekananda in Hindi

पूरा नाम     – नरेंद्रनाथ विश्वनाथ दत्त.
पिता          – विश्वनाथ दत्त.
माता          – भुवनेश्वरी देवी.
जन्म          – 12 जनवरी 1863.
जन्मस्थान   – कलकत्ता (पं. बंगाल).
शिक्षा          – 1884 मे बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण.
विवाह         –  विवाह नहीं किया.
संस्थापक     – रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ.
मृत्यु            – 4 जुलाई,1902.
मृत्यु स्थान    – बेलूर, पश्चिम बंगाल (भारत).

Swami Vivekananda Earlier Life (प्रारंभिक जीवन)

स्वामी विवेकानंद जी का जन्म कोलकाता शहर में 12 जनवरी सन 1863 को हुआ था. उनके पिता का नाम विश्वनाथ एवं माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था. विवेकानंद जी को बचपन से ही लोग प्यार से 'नरेंद्र' कह कर बुलाते थे. वे एक धनी परिवार से संबंध रखते थे. उनके घर का वातावरण शुरुआती समय से ही धार्मिक अवधारणाओं वाला था. दोपहर के समय में उनकी मां उन्हें गीता, रामायण, महाभारत काल की अनेकों कथाएं सुनाया करती थी. इसी वजह से स्वामी विवेकानंद जी को बचपन से ही रामायण, महाभारत आदि से संबंधित कथा एवं भजन कंठस्थ हो गए थे.

स्वामी विवेकानंद जी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई. इसके बाद वे आगे की शिक्षा प्राप्त करने के लिए अलग-अलग जगहों पर गए. विवेकानंद जी को व्यायाम खेलकूद आदि में काफी दिलचस्पी थी, वे हमेशा कुश्ती, बॉक्सिंग, तैराकी, दौड़ आदि में भाग लिया करते थे. उनका स्वास्थ्य काफी अच्छा था. लोग अक्सर उनके आकर्षक व्यक्तित्व को देखकर उनकी तरफ आकर्षित हो जाया करते थे. जब उनके पिता विचारशील लोगों से किसी विषय पर चर्चा करते थे तो नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद जी) भी उस सभा में भाग लेते थे.

वे अपनी समझ और विचारधारा से लोगों को प्रभावित कर दिया करते थे. जब भी वे किसी विषय पर गहनता से बोलते थे तो लोग उन्हें एकटक देखते रहते. उन्होंने कोलकाता से B.A. तक शिक्षा प्राप्त की तथा वे भारतीय संस्कृति के बारे में गहनता से अध्ययन करने लग गए, काफी गहन अध्ययन के बाद उनके मन में अनेक प्रकार के सत्य जानने की इच्छा जागृत हो गई. लेकिन तमाम शोधों के बाद भी वे संतुष्ट नहीं हुए.

 उनको कुछ समय पश्चात गुरु की कमी का आभास हो गया, उनको समझ आ गया कि वे गुरु के बिना सफल नहीं हो सकते. विवेकानंद जी सही मार्गदर्शन करने वाले योग्य व्यक्ति को अपना गुरु बनाना चाहते थे. क्योंकि उन्हें एक योग्य गुरु के बिना सही मार्गदर्शन मिलना संभव नहीं था. जहां एक तरफ उनका आध्यात्म की तरफ रुझान था, वहीं दूसरी ओर वे विवेक, बुद्धियुक्त एवं तार्किक व्यक्ति थे.

 ऐसी स्थिति में वे ब्रह्म समाज की ओर आकर्षित हुए. विवेकानंद जी का पहला प्रश्न था - "क्या ईश्वर का अस्तित्व है?" इस प्रश्न के उत्तर को प्राप्त करने के लिए वे अनेक बुद्धिजीवियों से मिले लेकिन उन्हें उनके प्रश्न का संतोषजनक उत्तर ना मिल सका. अतः उनकी भेंट 'स्वामी रामकृष्ण परमहंस' से हुई. विवेकानंद जी ने उनसे पूछा महानुभाव क्या आपने ईश्वर को देखा है. स्वामी रामकृष्ण परमहंस की तरफ से उन्हें उत्तर मिला - हां!! मैंने ईश्वर को देखा है, ठीक वैसे ही जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूं.

स्वामी रामकृष्ण परमहंस की बात सुनकर वे उनसे काफी प्रभावित हुए. उन्होंने मन ही मन सोचा - "चलो कोई तो ऐसा मिला, जो अपनी अनुभूति के आधार पर यह कह सकता है कि हां!! ईश्वर का अस्तित्व है. विवेकानंद जी का संशय दूर हो गया और यहीं से ही स्वामी विवेकानंद ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस अपना गुरु बना लिया. यहीं से उनको आध्यात्मिक शिक्षा का आधार मिला.

गुरु रामकृष्ण ने अपने असीम धैर्य द्वारा इस नवयुवक में भक्ति और क्रांतिकारी भावना का शमन कर दिया. उनके प्यार ने नरेंद्र का दिल जीत लिया और नरेंद्र ने भी गुरु को उसी प्रकार भरपूर प्यार और श्रद्धा दी.

Swami Vivekananda Career (स्वामी विवेकानंद जी का पेशेवर जीवन)

रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के बाद स्वामी विवेकानंद संत के भेश में मठ छोड़ कर निकल पड़े. उन्होंने संपूर्ण भारत में घूम-घूमकर गुरु रामकृष्ण के विचारों को फैलाना प्रारंभ कर दिया. वे भारतीय जनता से मिलते और उनके दुख-सुख बांटते. दलितों, शोषितों के प्रति उनके मन में विशेष करुणा भाव था.

कोलकाता में  "एक आदमी भूख से मर गया" यह समाचार पढ़कर स्वामी विवेकानंद द्रवित हो उठे, उन्होंने छाती पीटते हुए स्वयं से प्रश्न किया, 'धर्मात्मा कहे जाने वाले हम सन्यासियों ने जनता के लिए क्या किया है.' इसी समय उन्होंने लाचार लोगों की सहायता कर अपना पहला कर्तव्य किया. उनके द्रवित कंठ से यह सुर फूट पड़े - "पीड़ित मनुष्य की सेवा के लिए मुझे बार बार जन्म ले कर हजारों बार मरना पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगा".

स्वामी जी ने अपने जीवन में कई उद्देश्य निर्धारित किए. उनके लिए सबसे बड़ा कार्य, 'धर्म की पुनर्स्थापना' करना था. उस समय भारत में ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में बुद्धिजीवियों की धर्म से श्रद्धा उठती जा रही थी. अंत स्वामी विवेकानंद जी के लिए यह अति आवश्यकता था कि धर्म की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की जाए जो मानव जीवन को सुखमय बना सके.

उनके जीवन का दूसरा उद्देश्य हिंदू धर्म और संस्कृति पर हिंदुओं की श्रद्धा जमाए रखना था, जो उस समय यूरोप के प्रभाव में आते जा रहे थे. उनके जीवन का अंतिम उद्देश्य, भारत की संस्कृति इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं का योग्य उत्तराधिकारी बनाना था. स्वामी जी की वाणी और विचारों से भारतीयों में यह विश्वास जागृत हुआ कि 'उन्हें किसी के सामने मस्तक झुका के अथवा लज्जित होकर जीने की आवश्यकता नहीं है'.

लगभग 3 वर्ष तक स्वामी विवेकानंद जी ने संपूर्ण भारत का भ्रमण कर प्रत्यक्ष ज्ञान अर्जित किया. इस अवधि के दौरान वे अधिकांश पैदल ही चले. उन्होंने देश की अवनीति के कारणों पर मनन किया तथा उन साधनों पर विचार किया, जिनसे देश का उत्थान हो सके. भारत की दरिद्रता के निर्धारण हेतु सहायता प्राप्ति के उद्देश्य से उन्होंने पश्चिमी देशों की यात्रा का निर्णय लिया.

Swami Vivekananda Chicago (America) Speech (स्वामी विवेकानंद की शिकागो यात्रा)

सन 1893 ईसवी में शिकागो अमेरिका में संपूर्ण विश्व के धर्माचार्यों का सम्मेलन होना निश्चित हुआ. स्वामी जी के हृदय में यह भाव जागृत हुआ कि वे भी इस सम्मेलन में हिस्सा लें. 'खेतड़ी नरेश' जो कि उनके शिष्य थे. उन्होंने स्वामी जी की भावना की पूर्ति में सहयोग किया. खेतड़ी नरेश के प्रस्ताव पर उन्होंने अपना नाम 'विवेकानंद' धारण किया और अनेक प्रचंड बाधाओं को पार कर इस सम्मेलन में हिस्सा लिया.

 निश्चित समय पर धर्म सभा का कार्य प्रारंभ हुआ. विशाल भवन में हजारों नर-नारी, श्रोता उपस्थित थे. सभी वक्ता अपना-अपना भाषण लिखकर लाए थे. जबकि स्वामी जी ने ऐसी कोई तैयारी नहीं की थी. धर्म सभा में स्वामी जी को सबसे अंत में बोलने का अवसर दिया गया, क्योंकि वहां उनका कोई समर्थक नही था. ना ही उन्हें कोई पहचानता था.

स्वामी जी ने ज्यों ही श्रोताओं को संबोधित किया - "अमेरिका वासी बहनों और भाइयों" त्यों ही पूरा सभा भवन तालियों से गूंज उठा. बहुत देर तक तालियां बजती रहीं, पश्चिम के सभी वक्ताओं ने संबोधन में कहा था - "अमेरिका वासी महिलाएं एवं पुरुषों" लेकिन स्वामी जी के अपनत्व भरी संबोधन ने सभी श्रोताओं का हृदय जीत लिया.

 स्वामी जी ने आगे का व्याख्यान प्रारंभ किया. अंत में वक्ताओं ने जहां अपने-अपने धर्म और ईश्वर को श्रेष्ठ सिद्ध करने की कोशिश की थी, वहीं स्वामी विवेकानंद जी ने सभी धर्मों को श्रेष्ठ बताया. उन्होंने कहा - "हमेशा साथ चलो, खंडन नहीं विग्रह करो, समन्वय और शांति के पथ पर आगे बढ़ो".

 इस भाषण से उनकी ख्याति संपूर्ण विश्व में फैल गई. अमेरिका के अग्रणी पत्र 'दैनिक हेराल्ड' ने लिखा - "शिकागो धर्म सभा में विवेकानंद जी सर्वश्रेष्ठ व्याख्याता रहे", 'प्रेस ऑफ अमेरिका' ने लिखा - "उनकी बोली में कमाल का जादू है, उनके शब्द हृदय पर गंभीरता से अंकित हो जाते हैं".

Swami Vivekananda America Journey (स्वामी विवेकानंद जी की विदेश यात्रा)

स्वामी विवेकानंद जी की विदेश यात्रा से पहले सभी भारत वासियों का मानना था कि समुद्र यात्रा पाप है और विदेशियों के हाथ का खाना ग्रहण करने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है. स्वामी जी की विदेश यात्रा का एकमात्र उद्देश्य यह भी था कि वे भारतवासियों में फैले अंध विश्वास को तोड़ना चाहते थे कि समुंद्र यात्रा पाप नही है तथा विदेशियों के हाथ का खाना ग्रहण करने से धर्म भ्रष्ट नही होता है.

 स्वामी विवेकानंद जी भारत में अंग्रेज प्रभाव वाले लोगों को यह भी दिखाना चाहते थे कि भारत भले ही अपनी संस्कृति का आदर ठीक तरीके से ना करें, लेकिन पश्चिम के लोग उनसे जरूर प्रभावित हो सकते हैं. शिकागो सम्मेलन के बाद वहां की जनता के विशेष अनुरोध पर स्वामी जी 3 वर्ष अमेरिका और इंग्लैंड में रहे. इस अवधि में भाषणों, वक्ताव्यो, लेखों, वाद-विवादों के द्वारा उन्होंने भारतीय विचारधारा को पूरे यूरोप में फैला दिया.

विदेश यात्रा में उन्हें सबसे मधुर मित्र के रुप में जीजी गुडविन, सोवियत दंपत्ति और मार्गरेट नोब्ल मिले. जिन्होंने उनके कार्य एवं विचारों को सर्वत्र फैलाया. मार्गरेट नोब्ल ही 'रागिनी निवेदिता' कहलायी. इन्होंने पश्चिम में विवेकानंद जी की विचारधारा के प्रचार-प्रसार हेतु जितना कार्य किया, उतना किसी और ने नहीं किया. विदेश यात्रा के दौरान ही उनकी भेंट प्रसिद्ध विद्वान 'मैक्समूलर' से हुई, विवेकानंद जी ने उन्हें भारत आने का निमंत्रण दिया. मैक्समूलर स्वामी जी के ज्ञान एवं व्यवहार से अभिभूत हो गए.

● स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण

Swami Vivekananda Quotes in hindi (स्वामी विवेकानंद की विचारधारा)

स्वामी जी ने यूरोप और अमेरिका वासियों को भोग के स्थान पर संयम और त्याग का महत्व समझाया. जबकि भारतीयों का ध्यान समाज की आर्थिक व्यवस्था की ओर उत्कृष्ट था. स्वामी विवेकानंद जी ने इस दौरान अनेकों महत्वपूर्ण बातें कहीं, जो नीचे निम्नलिखित है :-

● जो व्यक्ति भूख से तड़प रहा हो, उसके सामने 'दर्शन' और 'धर्म ग्रंथ' परोसना उसका मजाक उड़ाना है. हमें उसकी भूख की चिंता होनी चाहिए ना कि उसकी मानसिकता की.

● भारत का कल्याण शक्ति साधना में है. यहां के जन जन में जो साहस और विवेक छिपा है, उसे बाहर लाना है. मैं भारत के हर व्यक्ति में लोहे की मांसपेशियां और फौलाद की नाड़ियां देखना चाहता हूं.

● स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि - "जब पड़ोसी भूखा मरता है, तब मंदिर में भोग लगाना पुण्य नहीं पाप है. वास्तविक पूजा निर्धन, दरिद्रता और रोगी और कमजोर की है. इसीलिए हमें मंदिर आदि में दान करने की बजाए बेसहारा और मजबूर लोगों की मदद करनी चाहिए. क्योंकि पैसे की जरूरत भगवान को नहीं अपितु इंसान को होती है."

● जो जाति नारी का सम्मान करना नहीं जानती, वह ना तो अतीत में उन्नति कर सकी है और ना ही भविष्य में उन्नति कर सकेगी. जो लोग नारियों का सम्मान नहीं करते उनका सारा जीवन व्यर्थ ही जाएगा.

● शरीर तो एक दिन जाना ही है फिर आलसियों की भांति क्यों जिया जाए, जंग लगकर मरने की अपेक्षा कुछ कर के मरना अच्छा है, उठो जागो और अपने अंतिम लक्ष्य की पूर्ति  के लिए कर्म में लग जाओ.


● स्वामी विवेकानंद के अनमोल विचार

Swami Vivekananda Death (स्वामी विवेकानंद जी की मृत्यु कैसे हुई?)

4 जुलाई सन 1902 के दिन वह प्राप्त काल से ही अत्यंत प्रफुल्ल दिख रहे थे. उस दिन वे ब्रह्म मुहूर्त में उठे, पूजा की, शिष्यों के बीच बैठकर रुचिपूर्वक भोजन किया, छात्रों को संस्कृत पढ़ाई, फिर एक शिष्य के साथ बेलूर मार्ग पर लगभग 2 मील चले और भविष्य की योजनाएं समझाई.

शाम हुई उन्होंने सन्यासी बंधुओं से वार्तालाप किया. स्वामी विवेकानंद जी ने राष्ट्रों के अदम्य और पतन का प्रसंग उठाते हुए कहा - "यदि भारत समाज संघर्ष में पड़ा तो नष्ट हो जाएगा". 7:00 बजे मठ में आरती के लिए घंटी बजी वे अपने कमरे में चले गये और गंगा की ओर देखने लगे. जो शिष्य साथ था उसे बाहर भेजते हुए कहा - "मेरे ध्यान में विघ्न नहीं होना चाहिए".

 45 मिनट बाद शिष्य को बुलाया और सब खिड़कियां खोलने को कहा, स्वयं भूमि पर बाईं करवट चुपचाप लेटे रहे. जब से सीने स्वामी जी को ध्यान मग्न प्रतीत होते देखा, तब उनके नथुनों और आंखों से थोड़ा रक्त बहता दिखाई दिया. उस समय ऐसा लग रहा था कि मानो वे समाधि में थे. इस समय उनकी अवस्था 39 वर्ष की थी.

इसी दिन संघर्ष त्याग और तपस्या का प्रतीक वह महापुरुष गुरु भाई और शिष्यों के कंधों पर जय जयकार की ध्वनि के साथ चिता की ओर जा रहा था. वातावरण में जैसे यह शब्द अब भी गूंज रहे थे. अंत 4 जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद जी के मृत्यु दिवस के रूप में जाना जाता है.
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