Panchatantra Ki Kahaniya | Panchatantra Short Stories in Hindi


Panchatantra Short Stories in Hindi With Moral : हर दोस्तों, आज इस लेख के माध्यम से हम आपको, 3 "Panchatantra Ki Kahaniya" सुनाएंगे. Panchatantra Ki Kahaniyan भारत के प्राचीन समय से जुड़ी हुई हैं. प्राचीन समय में पंचतंत्र की कहानियां का उपयोग गुरुकुलों में शिक्षा देने के लिए किया जाता था. उस समय panchatantra ki kahaniyon का अनुवाद संस्कृत में हुआ करता था, लेकिन बाद में विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की कहानियों का अनुवाद हिंदी में किया.

 वर्तमान समय में पंचतंत्र की कहानियों का अनुवाद दुनिया की सभी भाषाओं में हो चुका है. "panchatantra ki kahaniya" सभी देशों में बच्चों के लिए सबसे लोकप्रिय कहानी में से एक मानी जाती हैं. आज हम आपको 3 'panchatantra short stories in hindi' से अवगत कराएंगे. हम आशा करते हैं आपको panchatantra short stories in hindi पसंद आएंगी.

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 Panchatantra Short Stories in Hindi (Panchatantra Ki Kahaniya)

Panchtantra stories in hindi

 बुद्धिमान ब्राह्मण (Panchatantra Ki Kahaniya)


एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था. ब्राह्मण बहुत ही बुद्धिमान था. वह हर रोज पास के गांव और नगरों में भिक्षा मांगकर अपने परिवार का भरण पोषण करता था. एक दिन वह पास के एक नगर में भिक्षा मांगने के लिए गया. उस नगर के एक धनी सेठ के यहां बेटा पैदा हुआ था, इसी खुशी में उस सेठ ने ब्राह्मण को भिक्षा स्वरुप 100 स्वर्ण मुद्राएं दी.

 ब्राह्मण को आज से पहले इतना धन भिक्षा स्वरूप कभी नहीं मिला था. वह मन ही मन प्रसन्न हो गया और सेठ को दुआएं देते हुए आगे के घरों में भिक्षा मांगने के लिए निकल गया. दूसरे घरों से उसे रोज की तरह आटा मिला था. उस रोज ब्राह्मण ने अपने घर को लौटते समय स्वर्ण मुद्राओं को आटे के अंदर छिपा लिया. जिससे किसी को अनुमान न हो कि ब्राह्मण के पास स्वर्ण मुद्राएं हैं.

 वह रास्ते में यह सोच कर खुश था कि अब उसकी सभी मुसीबतें समाप्त हो जाएंगी और वह आराम से अपने जीवन को व्यतीत करेगा. लेकिन तभी रास्ते से गुजरते समय ब्राह्मण को डाकुओं का गिरोह मिला. डाकुओं के सरदार ने ब्राह्मण से कहा-- "ए ब्राह्मण! तेरे पास जो कुछ है, हमें दे जा. नहीं तो तुझे अपने प्राणों से हाथ धोने पढ़ सकते हैं".


यह बात सुनकर ब्राह्मण डर गया. लेकिन उसने धैर्य और बुद्धिमानी दिखाते हुए डाकुओं के सरदार से कहा-- "डाकू भाई! मेरे पास 100 सोने की मुद्राएं हैं. वह ले लो लेकिन मैं आपको यह आटा नहीं दे सकता". ब्राह्मण के मुंह से यह बात सुनकर डाकुओं का सरदार अचरज में पड़ गया. डाकुओं के सरदार ने कहा-- "क्यों रे ब्राह्मण! ऐसा क्या है, तेरे इस आटे में जो सोने की मुद्राएं देने के लिए तैयार हो गया है?"

ब्राह्मण ने सही मौका देखते हुए तपाक से उत्तर दिया-- "डाकू भाई! इस आटे में ऐसी अलौकिक शक्ति है, जो हर रोज 100 स्वर्ण मुद्राएं देती है". मुद्राओं को आटे से बाहर निकालते हुए ब्राह्मण ने कहा! यह सुनकर डाकू को सरदार सोच में पड़ गया. डाकूओ ने सोचा क्यों ना आटे को ही ले लिया जाए, जिससे हर रोज सो स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त होंगी और हम मालामाल हो जाएंगे.

 डाकूओ ने ब्राह्मण से आटा छीन लिया और उसकी 100 स्वर्ण मुद्राएं देकर उसे भगा दिया. इस तरह ब्राह्मण ने अपनी सूझबूझ और बुद्धि की कुशलता से अपनी जान और स्वर्ण मुद्राओं को बचा लिया. ब्राह्मण घर वापस लौटकर मजे से अपना जीवन व्यतीत करने लगा.

Moral Of Panchatantra Stories

 इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि-- जो लोग संकट के समय में धैर्य और बुद्धि से काम लेते हैं, वह हर मुसीबत का तोड़ आसानी से निकाल लेते हैं और सफलता को हासिल करते हैं.

जैसी करनी वैसी भरनी (Panchatantra Ki Kahaniya)

एक जंगल में एक भैंस और एक घोड़ा रहा करते थे. दोनों में बड़ी दोस्ती थी. दोनों हमेशा साथ-साथ घास चरते और साथ ही साथ पानी पीने के लिए जाया करते थे. लेकिन एक दिन किसी कारणवश भैंस और घोड़े में बहस छिड़ गई. बहस इस हद तक बढ़ गई कि दोनों में लड़ाई होने लगी. भैंस ज्यादा ताकतवर थी, उसके नुकीले सींग थे. इसीलिए भैंस ने घोड़े को सीगों की सहायता से काफी परेशान और चोटिल कर दिया.

 घोड़ा अपनी हार को बर्दाश्त न कर सका और भैंस से बदला लेने की योजना बनाने लगा और भैंस को सबक सिखाने के लिए वह इधर उधर भटकने लगा. तभी उसे एक आदमी दिखाई पड़ा, घोड़े ने सोच लिया कि अब इस आदमी से मदद लेकर भैंस को सबक सिखाएगा. घोड़े ने आदमी को सारी बात कह सुनाई और मदद के लिए प्रार्थना की.

आदमी ने घोड़े से कहा-- "देख भाई घोड़े! भैंस के सींग होते हैं और वह काफी ताकतवर भी होती है. भला मैं तुम्हारी कैसे मदद कर सकता हूं और आखिरकार मैं तुम्हारी मदद अपनी जान जोखिम में डालकर क्यों करूं. घोड़े ने आदमी को लालच देते हुए कहा-- "भैंस मीठा दूध देती है. जिससे आप और आपका परिवार दूध पीकर काफी मजे से रह सकता है. आप भैंस को डंडे की सहायता से पीट-पीटकर रस्सी से भेस को बांध सकते हैं".

आदमी घोड़े की बात मान गया और घोड़े की पीठ पर बैठ कर भैंस को काबू करने के लिए चल दिया. उस आदमी ने भैंस को डंडे से खूब पीटा और बांधकर घोड़े की सहायता से अपने घर ले आया. अब घोड़े ने उस आदमी से वापस जाने के लिए अनुमति मांगी. लेकिन उस आदमी ने घोड़े को अपनी सवारी करने के लिए बांध लिया. अब घोड़ा बहुत पछता रहा था, क्योंकि यदि वह आदमी को भैंस को सबक सिखाने के लिए नहीं कहता तो आज वह जंगल में आजाद घूम रहा होता. वह अपनी करनी पर काफी पछता रहा था.

Moral Of Panchatantra Stories

इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि- यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे का बुरा चाहता है तो स्वयं उसका बुरा पहले होता है. जैसे कि घोड़े ने जैसी करनी की उसे वैसा फल मिल गया.

बेवकूफ कौआ (Panchatantra Short Stories in Hindi)

एक कौआ मोरों को जब भी नाचते हुए देखता तो मन ही मन भगवान से दुआ करता और कहता-- "भगवान! आपने मोरों को कितना सुंदर बनाया है. यदि में भी ऐसा रूप पाता तो कितना मजा आता. ऐसे ही लगातार दिन बीतते गए. एक दिन कौआ जंगल में घूम रहा था. तभी उसे जंगल मे घूमते घूमते मोरों के कुछ पंख मिले. उन्हें देखकर कौआ खुशी से उछल पड़ा और कहने लगा-- "वाह! भगवान आप ने मेरी सुन ली. अब मे पंखों को अपनी पीठ पर सजाकर मोर जैसा बन सकता हूं.

फिर कौआ ने उन पंखों को अपनी पीठ पर लगा लिया और बड़े ही गुरुर के साथ मोरों के सामने पहुंचा. उसे देखते ही सभी मोर हंस पड़े. एक मोर ने कहा-- "जरा देखो उस दुष्ट कौवे को, यह हमारे फेंके हुए पंखों को लगाकर हमारे जैसा बनना चाहता है. लगाओ इस बदमाश कौवे में कस कर मार है". यह सुनते ही सभी कौवे उस पर टूट पड़े और उसे मार मार कर अधमरा कर दिया.
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 वह वहां से भागकर अन्य कौवो के पास जाकर मोरों की शिकायत करने लगा. तभी एक बुजुर्ग कौवा बोला-- "सुनते हो इस उधमी कौवे की बातें. यह हमारी बिरादरी का मजाक उड़वा रहा है.  मोर बनने के लिए हमेशा बावला रहता है. इसको यह भी ज्ञान नहीं कि जो प्राणी अपनी जाति से संतुष्ट नहीं रहता वह हर जगह अपमान पाता है. आज यह मूर्ख मोरो से पिटने के बाद हम से मिलने आया है, लगाओ इस धोखेबाज कसकर मार." इतना सुनते ही सभी कौवो ने उसकी अच्छी मरम्मत कर दी.

Moral Of panchatantra stories
ईश्वर ने हमें जिस स्वरुप में बनाया है उसी स्वरुप से संतुष्ट रह कर अपने कर्मों पर हमें ध्यान देना चाहिए. अन्यथा हमारा परिणाम उस कौए जैसा हो सकता है.
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